आज दिवाली है
अँधेरी रात में जैसे रौशनी की किरण जाने वाली है .
सुना था दिवाली में दीप जगमगाते हैं
खेल में बच्चे हँसते गुनगुनाते हैं .
फिजाओं में अनोखी एक मस्ती होती है ,
ख़ुशी से नाचती हर एक बस्ती होती है .
घटाएँ आसमा पर कभी छा जाती हैं ,
शीतल हवाएँ कभी तन को कपाती हैं .
माँ अपने बच्चों को प्यार में सिखाती हैं ,
बातों में श्रीराम की कथा सुनाती हैं .
अच्छे और बुरे का भेद कराती हैं ,
सच और झूठ का मर्म बताती हैं .
लोगों के चेहरे पर उमंग की लाली है ,
लो आई आज फिर से दिवाली है .
लगता है आज बातें कुछ बदली हुई हैं ,
फिजा की रंगत में कालिमा घुली हुई है .
आज मैं एक बड़े नगर महान में ,
ऐसा लगे जैसे युद्घ के मैदान में .
बच बचकर भी भटक रहा हूँ ,
कदम कदम पर ठिठक रहा हूँ .
सड़कों के किनारों से ,
बंदूकों और मोर्टारों से .
गोलियों की बौछार है ,
आज फिर दिवाली का त्यौहार है .
बमों के धमाकों से ,
फूटते पटाखों से .
मैं हर पल सहमता हूँ ,
पापा के हाथों को कसकर पकड़ता हूँ .
हर और सिर्फ शोर ही शोर है ,
जिंदगी और मौत की अजीब से दौर है .
तभी कान के पास रॉकेट की सनसनाहट है ,
पास आ चुकी मौत की आहट है .
फूटे पटाखों के कागज मैदान पर ,
बिखरी हैं लाशें जीवित शमशान पर .
संकरी सी सड़कों पर वाहन भी आतें हैं ,
दुकानें भी लगीं हैं और लोग आते जाते हैं .
वहां पर भी फूटती लड़ियों का दौर है ,
क्या करें ? दिवाली पर पटाखों का ही जोर है .
आँखें है जल रही और सांसे भी दहकती हैं ,
प्रदूषण के वेग से प्रकृति तडपती है .
धुल की फुहार है और धुएँ का गुबार है ,
भाई आज तो दिवाली का त्यौहार है .
बातें अलबेली तो बहुत सी हैं ,
सभी की जिंदगी चंगुल में फंसी हैं .
एक आदमी चलते चलते लड़खडाता है ,
मुझे लगा जंग में घायल कराहता है .
वो बेचारा न पैसों न खाने के लिए जीता है ,
है एक शराबी जो पीने के लिए ही जीता है .
घर में एक दाना न हो ,
पर मधुशाला के द्वारे जातें हैं .
बच्चों पत्नी को मार पीटकर ,
नशे का भोग लगातें हैं .
अगर पैसे कुछ बचे नशे से ,
जुए की भेंट चढ़ जातें हैं .
खुद के घर को आग लगाकर ,
दूजे का जेब भर आतें हैं .
शराबिओं की ऐश और जुआरियों की हरियाली है ,
लो आ गयी आज फिर से दिवाली है .
अमीरों को ये सबसे प्यारी ,
इसीसे टिकी है दुनियादारी .
लोगों के मन का द्वेष बढ़ने ,
लाखों के पटाखे लाओगे .
पैसों की झूठी शान दिखाने ,
धरती के जख्म बढाओगे .
है पैसों का अति दिखावा
तो उपाय बतलाता हूँ .
लाखों के सीधे नोट जला लो ,
ज्यादा नाम कमाओगे .
सबको पद और धन दिखाकर ,
जैसे जग की खुशियाँ पा ली .
धनी निर्धन का भेद बढाती ,
आ गयी फिर से दिवाली .
धरती माता सिसक रही है ,
बाल वृद्ध अब तड़प रहे हैं .
तबाही का मंज़र देख रहा हूँ ,
सब पर नज़रें फेक रहा हूँ .
जंग से बदतर ये बरबादी ,
मस्त नाचते धनी शराबी .
जल स्रोतों का काला हो चुका
हवा में प्रदूषण मचल रहा है ,
सिर्फ शोर में बातें हो रही
धरती का रूप बदल रहा है .
इससे पहले नष्ट हो जाएँ ,
आओ फिर से दिया जलाएं .
सुख समृधि के दीप जलाकर ,
इसकी वापस शान लौटाएं .
नहीं करनी है बातें खाली ,
बदल डालें जग की दिवाली .


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